वक़्त का कर्ज़, debt of time

वक़्त का कर्ज़, Debt Of Time

राजीव प्रसाद एक गाँव के अच्छे शिक्षक थे।गाँव में उन्हें सम्मान की नजरों से देखा जाता था। लेकिन अब वे शहर के एक फ्लैट में अपने बेटे सोहन के साथ रहते थे। उम्र ढल चुकी थी, शरीर में पहले जैसी ताक़त नहीं रही, लेकिन मन अब भी ज़िंदगी से जुड़ना चाहता था।

सोहन पढ़ा-लिखा, समझदार युवक था, लेकिन इतना व्यस्त कि अपने पिता से दो शब्द बाते करने की भी समय नहीं था।

रम्भा , सोहन की पत्नी, संयमी और समझदार थी, पर आधुनिक सोच के कारण सास-ससुर की सेवा को बोझ समझती थी।

हर रात खाने की मेज़ पर तीन प्लेटें लगती थीं सोहन, रम्भा और उनके बेटे राजू के लिए।
राजीव जी की थाली रसोई में अलग लगती थी।

वक़्त का कर्ज़, debt of time

एक दिन राजू ने मासूमियत से पूछ लिया –
“दादू हमारे साथ क्यों नहीं खाते?”

रम्भा ने बात टालते हुए कहा –
“उनकी आदतें अलग हैं, बेटा।”

सोहन मोबाइल चलाने में व्यस्त था वह कुछ नहीं बोला।

राजीव जी चुपचाप मुस्करा दिए। वो समझ चुके थे कि अब वे सिर्फ घर में "हैं", लेकिन अब उनकी जरुरत नहीं रही।

एक दिन सोहन को राजीव जी की पुरानी डायरी मिल गयी। उसने यैसे ही एक पन्ना खोला और पढ़ना शुरू किया:

वक़्त का कर्ज़, debt of time

"आज बेटे को पहली बार स्कूल छोड़ा। उसका हाथ नहीं छोड़ना चाहता था, पर वह मुस्कराकर बोला – 'पापा, मैं बड़ा हो गया!' मेरी आँखें भर आईं, लेकिन मैंने भी मुस्कराने की कोशिश की।"

सोहन कुछ पल के लिए रुका, आँख भर आया।
पर तभी मोबाइल की रिंग बजी – और वह फिर "वर्तमान" में लौट गया।

रविवार को राजू ने ज़िद की 
“पापा, आज हम सब पार्क चलें, दादू को भी ले चलो।”

रम्भा ने टालने की कोशिश की, लेकिन सोहन ने पहली बार हामी भरी –
“हाँ, आज पापा भी चलेंगे।”

पार्क में सब हँसी-खुशी समय बिता रहे थे। राजू झूले पर झूल रहा था और राजीव जी कुछ दूरी पर एक बेंच पर बैठकर बच्चों को देख रहे थे।

वक़्त का कर्ज़, debt of time

सोहन उनके पास आकर बैठ गया और पूछा –
“पापा, कुछ याद आ रहा है?”

राजीव जी मुस्कराए –
“जब तू छोटा था, यहीं झूला झूलता था। एक बार गिरा भी था और बोला था, ‘पापा, मत छोड़ना।’”

सोहन की आँखें नम हो गईं।

अगली सुबह राजीव जी को तेज बुखार आ गया।
डॉक्टर ने कहा – “कमज़ोरी है, चिंता की बात नहीं, लेकिन देखभाल की ज़रूरत है।”

सोहन ने पहली बार ऑफिस से छुट्टी ली और पिता के पास बैठा रहा।

राजीव जी ने धीमे स्वर में कहा –
“बेटा, मैंने तुझे चलना सिखाया... तू दौड़ना सीख गया... लेकिन कभी-कभी रुकना भी ज़रूरी होता है।”

सोहन के पास कोई जवाब नहीं था।
उसने पिता का हाथ थाम लिया।

धीरे-धीरे राजीव जी की तबीयत ठीक होने लगी।
अब सोहन हर शाम कुछ समय उनके साथ ज़रूर बिताता।
राजू अब दादू के साथ खेलने लगा।
रम्भा को भी चीज़ें अलग नज़र आने लगीं — अब सास-ससुर उसकी ज़िम्मेदारी नहीं, परिवार का हिस्सा लगने लगे।

एक दिन राजीव जी ने एक पुरानी फाइल सोहन को सौंपी।

“इसमें ज़मीन-जायदाद कुछ नहीं है, बेटा... बस तेरा बचपन है — तेरे स्कूल की ड्रॉइंग्स, तेरी माँ की चिट्ठियाँ और वो पुराने खत, जिनमें तू ‘राजकुमार’ कहलाता था।”

सोहन की आँखों से आंसू गिर पड़े।

उस रात खाने की मेज़ पर चार प्लेटें लगी थीं।
राजीव जी, पहली बार, अपने परिवार के साथ बैठकर खाना खा रहे थे।

राजू बोला – “दादू, आपको पता है? आप मेरे सबसे अच्छे दोस्त हो।”

राजीव जी ने मुस्कराते हुए सिर सहलाया।


 शिक्षा:

“माता-पिता के समय को बोझ नहीं, आशीर्वाद समझिए। जो बचपन में आपका हाथ थामे रहे, उनका बुढ़ापा अकेले ना गुजरने दीजिए। वक़्त का कर्ज़, शब्दों से नहीं, साथ से चुकाया जाता है।

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